Friday, February 19, 2016

कुछ पल होश खो देने के(अनुभव)

बिना बेड़ियों के कैद थी...भागना चाह रही थी लेकिन पहाड़ बधे थे पैरों में... हांफ रही थी  ... रास्ता न था...रोशन भी कुछ न था...धुंधलका पसरा था.... आँखे फाड़ रही थी..पर सब व्यर्थ

वो कुछ जंगल सा था... लोहे के मोटे मोटे  सरिया से बना हुआ भयानक जंगल..चारो ओर लोहा ही लोहा  ...जैसे किसी बड़ी इमारत को बनाने की तैयारी हो रही हो..

 आवाज़ें हाँ आवाजें सुनाई दे रहीं थी.. अस्पष्ट जैसे मंत्र बुदबुदाये जा रहे हो... या की जोर जोर से संवाद बोले जा रहे हों ...और कभी सुनाई देते ठहाके ,जोरदार  ...फिर कोइ पुकारता सुनो.. सुन रही हो ..सुन भी लो.. मैं सुनना चाहती थी ,देखना चाहती थी, पर कोशिशें व्यर्थ थी ...

सारी इन्द्रियां निष्क्रिय थीं....एक आवाज़ लगातार गूंज रही थी, बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह ...जैसे धातु के असंख्य पत्तर रगड़े जा रहे हो...लगातार....दिमाग के फट जाने की हद तक सुनाई देनेवाली आवाज.. फिर चीख जैसी सुनाई देने लगी ...एक नारी कंठ की चीख...अस्पष्ट

  तभी हौले से छुआ किसी ने.. देवदूत सा चेहरा बुला रहा था... गुलाबी पानी था नदी में ...उस पार हरे पहाड़ ... वहाँ एक बांसुरी रखी थी... मोर के कुछ पंख भी...बांसुरी बज रही थी... पंख यहां वहाँ उड़ रहे थे

.....अब माँ की स्पष्ट आवाज़ सुनाई दे रही थी....माँ गा रही थी " नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना ".......

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