Tuesday, March 10, 2015

जिजीविषा
















वंचित जन
उग आते है
जंगलों से, झाडो से,
किसी खँडहर की गिरी दीवारों से
बंजर जमी की फटी बिवाईयों से
परवाह नहीं होती किसी की
सोचते भी नहीं कुछ भी
ये उपेक्षित
अक्खड लोग
जड़े जमा लेते है कही भी  
न हो खाद, पानी
हवा, सूरज का प्रकाश
न हो लालन-पालन का स्नेह
फिर भी एक जिद होती है
अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जिद
अपने जीवन को मुकम्मल बना लेने की जिद
ज़िंदा होने की गरिमा को बरकरार रखने की जिद
और वे उगते रहते है निरंतर
कुचले जाने के बाद भी
उखाड़ कर फेक दिए जाने के बाद भी  
सर उठाते है हर बार
बार – बार
लगातार