Wednesday, November 25, 2015

सफ़ेद रंग (कविता)

कई रंग बटोरे
कुचियों को भी पकड़ा
आड़ी तिरछी रेखाएँ खींच ली
और कैनवास तो
जैसे तैयार ही बैठा था
सज जाने को
निखर जाने को

पर ज्यूंही भरनी चाही
लाल, पीली, हरी,
गुलाबी, नीली, मुस्काने
सब उड़ गयीं
गायब हो गयीं
जैसे कभी थी ही नहीं
जैसे कभी होंगी भी नहीं
बचा रह गया एक कोने में
सहमा सिकुड़ा सफ़ेद रंग
अपने होने पर घबराता सफ़ेद रंग
अनचाहा, पर जाना-पहचाना सफ़ेद रंग

मान लिया, सोच लिया ,स्वीकार किया
न हो दूसरे रिश्ते जीवन के
पर यह तो है न
जीवन का साथी, मेरी पहचान
सब रंगो का मूल
यह उदास सफ़ेद रंग
-----स्वयम्बरा






1 comment:

GathaEditor Onlinegatha said...

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