मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, April 11, 2015

चिमनिया




उग आयी है चिमनिया चारो ओर
गुरुता का गुरुर है इनमे
ये अट्टाहास लगाती है
छिन लेती हैं मिट्टी की चिर-परिचित गंध 
सुलगती हैं 
उगलती है गहरा काला कोहरा 
सिकुड़ता जाता है नीला आकाश
और
हवा की साँसे घुटती चली जाती है

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