Friday, September 26, 2014

लडकी


लडकी,
बोल मत,
हंस मत,
देख मत,
सुन मत
ढांप खुद को,
खाना बना,
सफाई कर
और इन आवाज़ो से
थोडी सी फुरसत मिलते ही
लडकी
चुपके से
खोल देती है खिडकी
एक टुकडा धूप
और मुट्ठी भर हवा मे
अंगडाई लेकर
ठठाकर  हंस देती है
......स्वयम्बरा

9 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना शनिवार 27 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

स्वयम्बरा said...

जी आभार....

Lekhika 'Pari M Shlok' said...

Baut sunder abhivyakti.... !!

Yashwant Yash said...

बहुत ही बढ़िया

सादर

Smita Singh said...

waah bahut hi jabardast rachna...

Smita Singh said...

waah bahut hi jabardast rachna...

स्वयम्बरा said...

शुक्रिया ...आप सभी का

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर प्रस्तुति !
आज आपके ब्लॉग पर आकर काफी अच्छा लगा अप्पकी रचनाओ को पढ़कर , और एक अच्छे ब्लॉग फॉलो करने का अवसर मिला !

स्वयम्बरा said...

jee aabhar...