Thursday, June 13, 2013

जिंदगी मे 'रिवर्स गियर' नही होता

चल,
फिर से बच्चा बन जाते है
लड़ते है, झगड़ते है
रूठते है, मनाते है
कट्टी ..कट्टी ....कट्टी
मेल्ली ...मेल्ली ..मेल्ली 

और जो मेल्ली न हो पाया तो?

उह!
हटाओ न, समझदारी का खोल
फेंक दो ना बड़प्पन दूर... बहुत दूर
खेलोगी, आंख मिचौली ?
देंगा-पानी, रुमाल चोर?

हाँ, सब खेल ही तो है !

फिर वही बात ?
ओ सयानी,
चल सुनाती हूँ एक कहानी
फूलकुमारी की
जब हंसती थी तो सारे फूल हँसते थे

जब रोती थी तो.......?

ओ....हो !
चल एक नाव बनाये
खेवेंगे साथ-साथ
बादलों के देश में ले जायेंगे उसे

अच्छा!
पल भर भी टिकेगी तेरी कागज़ की नाव ?

अब तू सुन!
छोड़ ये मासूमियत
ओढ़ ले मुखौटा
बन जा सयानी
मत उलझ,
सपनो की दुनिया में
कि नहीं आता बचपन कभी लौटकर
कि नहीं होता कोई जिसकी ऊँगली पकड़ चल पड़े हम
क्यूंकि जिंदगी मे  'रिवर्स गियर' नही होता
क्यूंकि  जिंदगी मे 'कोई' रिवर्स गियर नही होता
(आत्मालाप )

........स्वयम्बरा

Wednesday, June 12, 2013

'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान'



यवनिका 1993 से सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय रही है. वर्ष 1994 से 'यवनिका सम्मान ' की शुरुआत की गयी ...हालाँकि उसके बाद कई साल गुज़र गए ...अब तक जिन्हें सम्मानित किया गया है वो है ...राधा चरण सिंह (खेल), प्रो श्याम मोहन अस्थाना (रंगमंच ), पंडित देव नंदन मिश्र (शास्त्रीय संगीत ), डॉ के. बी. सहाय (कलाक्षेत्र-चिकित्सा व् समाज सेवा ), श्रीमती उर्मिला कॉल (साहित्य जगत ) .

वर्ष 2010 से इसे फिर से शुरू किया गया, जिसके तहत वैसे वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने समाज को एक सकारात्मक दिशा दी है. सम्मान में एक प्रतीक चिन्ह, शाल, प्रशस्ति -पत्र दिया जाता रहा है. वर्ष 2012 से सम्मान का नाम 'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान' गया . साथ ही सम्मान में 5001 रुपये की धनराशि भी जोड़ी गयी, जिसे 'बक्सी परिवार' वहन करता है .... ज्ञात हो कि 'बक्सी जी' यवनिका के संस्थापक सदस्य व् मुख्य संरक्षक थे , जिनका देहांत २०१२ के अगस्त माह में हो गया .

पिछले साल यह सम्मान 'बक्सी जी' की जन्मतिथि 23 दिसंबर को 'श्री सियाराम निर्भय जी' को दिया गया..'निर्भय जी' को उनके सामाजिक- साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया...आर्य समाज से जुड़े निर्भय जी ने 1974 के जे. पी. आन्दोलन में भी योगदान दिया था ..उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया ...

"सच कहना अगर बगावत है तो समझो की हम बागी है'' इनकी प्रसिद्द कविता थी....तत्कालीन सरकार ने इन्हें और इनके लेखन को प्रतिबंधित कर जेल में डाल दिया ..

इस वर्ष भी 'यवनिका सम्मान ' दिया जायेगा...इसमें आप सबो का सहयोग चाहिए..यदि आप 'भोजपुर' में ऐसे बुजुर्गो को जानते है जिन्होंने अपने कार्यों से समाज को एक दिशा दी हो तो हमें बताये... क्यूंकि किसी ने कहा है-
                                               "मंदिर-ओ -मस्जिद में जाना कोई बात नहीं,
                                            हो बुजूर्गों की क़द्र-ओ- इबादत मगर नमाज़ से पहले" 





Sunday, June 9, 2013

डायरी के पन्ने

डायरी के पन्ने
दिनांक : 12.10.1998
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वह लावारिश लाश
पड़ी थी उधर
मुह खोले, टांग पसारे, हाथ फैलाये
सुना है कल रात किसी ने गोली मार दी उसे
यही बीच सड़क पर
तब भीड़ थी यहाँ
सुना है वह खूब चीखा, पुकारता रहा,
सबने अनसुनी, अनदेखी की,
भागते रहे गंतव्य की ओर,
झांकते रहे झिर्रियों से ,
जिसका चलन है शहर में
पुलिस आयी
लाल बत्ती, खाकी वर्दी, चमकते सितारे समेत,
उसके मरने तक खड़ी रही
इन्क्वायरी (?) के लिए
सुना है
वह लड़ता था ऊँची अट्टालिकाओं से
हक की लडाई
और कहते है,
इन्काउन्टर नहीं
मुठभेड़ हो गया, गुंडों का
मारा गया वह,
लोग गुजरने लगे है अब वहां से,
सफ़ेद रेखाओं के ऊपर से भी
पहियों, कदमो की धूल ने ढँक दिया  है
लाल धब्बों को,
अब तो ये भूली सी बात है
लोकतंत्र तो जनसमूह है न,
यहाँ अकेले की क्या बिसात है .

(जाने किस मनःस्थिति में इन शब्दों का सृजन हुआ था )