Monday, January 21, 2013

ये कैसी शिक्षा व्यवस्था ??

जब छोटी थी तब 'माँ ' अक्सर अपने बचपन की कहानी सुनाया करती ...वो बताती कि प्राईमरी स्कूल में उन्हें 'बोरा' (थैलियाँ जिनमे अनाज रखे जाते है ) लेकर जाना पड़ता था ...असल में उनमें बेंच नहीं थे ...ऐसे में 'बोरा' बैठने के काम आया करता....इन किस्सों को सुनकर मैं हैरान हो जाती ..क्योंकि मेरे लिए ये अनोखी बात थी...स्कूल, वो भी बिना बेंच के !! ...और पढाई बोरा पर बैठकर ??....अपनी माँ पर तरस आता, बुरा भी लगता और स्कूल की व्यवस्था पर हंसी भी आती ..कभी -कभी माँ मुझे डांटते हुए बोलती कि पढ़ोगी नहीं तो बोरा वाले स्कूल में नामांकन करा देंगे ...तब बहुत डर लगता ..हालाँकि उम्मीद नहीं थी कि ऐसा स्कूल अब भी होता होगा....

खैर... 'बाल महोत्सव' का आयोज़न के दौरान गांवों के स्कूलों के बारे में जाने-समझने का मौका मिला...शिक्षको और अभिभावकों से सुनने को मिला कि शिक्षा प्रणाली में घुन लग चूका है....कि शिक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च किया जा रहा है, पर 'वहीँ ' सबसे ज्यादा लूट है..कि शिक्षक नियुक्ति में सबसे ज्यादा धांधली हुई है ... कि विद्या के घर में विद्या छोड़कर बाकि सबका बसेरा है..वगैरह-वगैरह...

ग्रामीण बच्चों की मांग पर इस बार बाल महोत्सव ब्लाक स्तर पर भी आयोजित किया गया ...पहला पड़ाव कुल्हरिया में था ... दूसरा पड़ाव बडहरा के गाँव पडरिया में स्थित मध्य विद्यालय में था ...यात्रा सुखद रही...बांध पर बनी सड़क...बगल में बहती गांगी नदी...वृक्षों की कतार .. दूर तक फैले हरे-भरे खेत ....और छोटे-छोटे बच्चों का साथ (जो हमारे साथ आरा से गए थे ) ने यात्रा का अहसास तक नहीं होने दिया ....बहुत खुश होकर हम विद्यालय में दाखिल हुए ...भवन देखा तो अजीब सा लगा...बहुत पुराना तो नहीं था पर जगह-जगह दरारें आ चुकी थी...हालाँकि प्रांगन में ढेर सारे पेड़ों को देखकर हम खुश हो गए...अब बच्चों के बैठने की बारी थी..इसलिए हमने क्लासरूम का जाएजा लेना चाहा ..एक कमरे में कदम रखा देखा एक तरफ बेंच रखे है और दूसरी तरफ जमीन पर बोरे बिछे हैं...दूसरे कमरे में गयी वहां भी यही हाल...तीसरे, चौथे, पांचवे कमरे में तो एक भी 'बेंच' नहीं था...बोरा भी नहीं था (हाँ भाई, आखिर कितना बोरा भला स्कूल खरीदेगा ??) इसलिए बच्चे उसे घर से लाते थे ...झटका लगा ...अबतक गाँव के स्कूलों के दुर्भाग्य की गाथा सुना करती थी, आज देख रही थी...अपने बचपन में इस स्थिति की कल्पना मात्र से कितना डरती थी पर यहाँ के बच्चे, रोज उसका सामना करते है ...और बाकी साल उसपर बैठ भी जाये पर जब ठण्ड अपने चरम पर होती होगी तब ?? मन भर गया ...महोत्सव का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया ...सोच में पड़ गयी कि 'माँ' के प्राईमरी स्कूल जाने के वर्ष के बाद से कितने साल गुज़र गए हैं , पर हालात अब भी ज्यों की त्यों हैं ....क्या यही है इक्कीसवी सदी ?? सुनती हूँ कि सरकार शिक्षा पर बहुत ज्यादा खर्च करती है...फिर इन स्कूलों की ऐसी बदहाली क्यूँ?
जब छोटी थी तब  'माँ ' अक्सर  अपने बचपन की कहानी सुनाया करती ...वो बताती कि प्राईमरी स्कूल में उन्हें  'बोरा' लेकर जाना पड़ता था ...असल में उनमें बेंच नहीं थे  ...ऐसे में  'बोरा' बैठने के काम आया करता....इन किस्सों को सुनकर मैं हैरान हो  जाती ..क्योंकि मेरे लिए ये अनोखी बात थी...स्कूल, वो भी बिना बेंच के !!   ...और पढाई बोरा पर बैठकर ??....अपनी माँ पर तरस आता, बुरा भी लगता और स्कूल  की व्यवस्था पर हंसी भी आती ..कभी -कभी माँ मुझे डांटते हुए  बोलती कि पढ़ोगी नहीं तो बोरा वाले स्कूल में नामांकन करा देंगे ...तब बहुत डर लगता ..हालाँकि उम्मीद नहीं थी कि ऐसा स्कूल अब भी होता होगा....

खैर... 'बाल महोत्सव' का आयोज़न  के दौरान गांवों के स्कूलों के बारे में जाने-समझने का मौका मिला...शिक्षको और अभिभावकों से सुनने को मिला कि शिक्षा प्रणाली में घुन लग चूका है....कि शिक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च किया जा रहा है, पर 'वहीँ ' सबसे ज्यादा लूट  है..कि शिक्षक नियुक्ति में सबसे ज्यादा धांधली हुई है ... कि विद्या के घर में विद्या छोड़कर बाकि सबका बसेरा है..वगैरह-वगैरह...

ग्रामीण बच्चों की मांग पर इस बार बाल महोत्सव ब्लाक स्तर पर भी आयोजित किया गया ...पहला पड़ाव कुल्हरिया में था ... दूसरा पड़ाव बडहरा के गाँव पडरिया में स्थित मध्य विद्यालय में  था ...यात्रा सुखद रही...बांध पर बनी सड़क...बगल में बहती गांगी नदी...वृक्षों की कतार .. दूर तक फैले हरे-भरे खेत ....और छोटे-छोटे बच्चों  का साथ (जो हमारे साथ आरा से गए थे )  ने यात्रा का अहसास तक नहीं  होने दिया ....बहुत खुश होकर हम विद्यालय में दाखिल हुए ...भवन देखा तो अजीब सा लगा...बहुत पुराना तो नहीं था पर जगह-जगह दरारें आ चुकी थी...हालाँकि प्रांगन में ढेर सारे पेड़ों को देखकर हम खुश हो गए...अब बच्चों के बैठने की बारी थी..इसलिए हमने क्लासरूम का जाएजा लेना चाहा ..एक कमरे  में कदम रखा देखा एक तरफ बेंच रखे है और दूसरी तरफ जमीन पर बोरे बिछे हैं...दूसरे कमरे में गयी वहां  भी यही हाल...तीसरे, चौथे, पांचवे कमरे में तो एक भी 'बेंच' नहीं था...बोरा भी नहीं था (हाँ भाई,  आखिर कितना बोरा भला स्कूल खरीदेगा ??)  इसलिए बच्चे उसे घर से लाते थे ...झटका लगा ...अबतक गाँव के स्कूलों के  दुर्भाग्य की  गाथा सुना करती थी, आज देख रही थी...अपने बचपन में इस स्थिति की कल्पना मात्र से कितना डरती थी पर यहाँ के बच्चे, रोज उसका सामना करते है ...और बाकी साल उसपर बैठ भी जाये पर जब ठण्ड अपने चरम पर होती होगी तब ??  मन भर गया ...महोत्सव का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया ...सोच में पड़ गयी कि 'माँ'  के प्राईमरी स्कूल जाने के वर्ष के बाद से कितने साल गुज़र गए हैं , पर हालात अब भी ज्यों की त्यों हैं  ....क्या यही है इक्कीसवी सदी ?? सुनती हूँ कि सरकार शिक्षा पर बहुत ज्यादा खर्च करती है...फिर इन स्कूलों की ऐसी बदहाली क्यूँ?
                  बडहरा के गाँव पडरिया में स्थित मध्य विद्यालय

एक थी मुस्कान


एक थी मुस्कान (बदला हुआ नाम )....इंटर की छात्रा ....गडहनी ( भोजपुर, बिहार का ग्रामीण क्षेत्र) की निवासी....उसने भी अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष किया था ....यही नहीं उसने उन युवकों के विरुद्ध प्राथमिकी भी दर्ज कराई क्यूंकि उसे देश के कानून पर आस्था थी .....

बस, इसी एक कदम ने उसके जीवन को इतना यातनामय बना दिया की अंततः मुस्कान ने मौत को गले लगा लिया ...जैसे की एक 'अपराध' को सहन ना करके उसके खिलाफ आवाज़ उठाना एक 'पाप' हो ....उसे घर में बंद करने का फरमान जारी हुआ...बदचलन होने का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया...माता-पिता सभी अपनी इज्ज़त की दुहाई देने लगे और उसे मुंह बंद रखने का आदेश सुना दिया ...मुस्कान इनसे जूझ नहीं सकी और ज़हर खा लिया .....हद तो यह की मर जाने के बाद भी उसे चैन से रहने नहीं दिया गया...लोगों ने मुस्कान को पागल घोषित कर दिया और सारा मामला रफा-दफा हो गया .....

ये उसी वक़्त की घटना है जब सब सड़ी हुई मानसिकता और व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलनरत थे...वी वांट जस्टिस, वी वांट जस्टिस चिल्लाये जा रहे थे ...जबकि मुस्कान अकेले 'न्याय' पाने की लडाई लड़ रही थी.... उसके समर्थन में नारे नहीं लगे ...उसकी याद में मोमबत्तियां भी नहीं जलाई गयी .... जब वह मर चुकी तो उसे इंसाफ दिलाने के लिए पूरे देश उठकर खड़ा नहीं हुआ ....न..ये कोई शिकायत नहीं बल्कि एक हकीक़त की ओर इशारा भर है की तमाम हो -हंगामे के बावजूद ऐसी घटनाएँ लगातार घट रही है ....सड़ी मानसिकता का विरोध करने के बजाय स्त्री के वस्त्रो और उसके व्यवहार पर बहस हो रही है.....और अब तो फिर से 'चुप्पी' पसर रही है... भयावह चुप्पी .....