मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Friday, March 23, 2012

बन्दर मामा,मम्मी आ गयी है!!अब डराकर दिखाओ!


आज कल हमारे शहर में बंदरों का आतंक बढ़ गया है ..ये हर वक़्त पूरी फौज के साथ चलते है... हर दूसरे दिन हमारे घरों पर धावा बोलते हैं और सब कुछ तहस-नहस कर देते है (वैसे जब हमने उनके आशियाने को उजाड़ दिया है तो शिकायत का हमें  अधिकार कहाँ? ) ..फलों के पेड़ वाले घर  खास तौर पर निशाना बनते हैं ...हमारे घर में भी एक अमरुद का पेड़ है.. उसपर फल लदे पड़े हैं...पर क्या मजाल की हम एक  भी चख सकें ..'हुजुर लोगों' से इतनी मिन्नतें करते है फिर भी उन्हें दया नहीं आती ....हम देखते रह जाते  है और वो...वो तो पेड़ पर बैठ कर मज़े में फलों को खाते है ...कुछ को चखते है ....शेष को फेंक देते है ...इन महानुभावों के डर से हमने अपने घरों में ग्रिल लगा लिया है... गली मोहल्ले में भी ये अपनी हुकूमत चलाते  रहते है...हश, हुश ...हश, हुश करने ,  डंडा लेके उन्हें डराने का प्रयास भी बेकार हो जाता है ..उल्टा उनके डर से हम ही छिप-छिप कर निकलते है... होलीवुड की एक मूवी  'प्लानेट ऑफ़ एप्स'  के मानव प्रजाति जैसे हमारे 'हालात' हो गए  है...एकदम 'बेचारे' से...
खैर अब मुद्दे पर आती हूँ ....कल की घटना है ...एक ढाई-तीन साल बच्चा , वाटर बोतल घुमाते हुए, उछल-कूद करते हुए, अपने में मगन गली में चला आ रहा था कि अचानक एक 'बन्दर' कूद के सामने आ गया.. बच्चा डर गया ...जोर-जोर से रोने लगा ...'बन्दर' ने उसपर एक मामूली दृष्टि डाली और  वही खड़े सब्जी के ठेले पर चढ़ गया...अब 'बच्चे' को गुस्सा आया ....उसने  हिम्मत की और ठेले पर चढ़े 'बन्दर' को चिल्ला-चिल्ला कर डांटने लगा...'बन्दर' ने ये देखा तो  वो भी गुस्सा हो गया ..उसने भी दांते निकालकर 'बच्चे' को डराया...'बच्चा'  डर कर पीछे भागा....'बन्दर' अब सब्जियां खाने लगा...'बच्चे' ने फिर से हिम्मत बटोरी और दूर से ही 'बन्दर' पर गुस्साने लगा ...'बन्दर' ने अब तक 'बच्चे' को कमज़ोर मान लिया था लिहाज़ा उसने ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा ...तब तक 'बच्चे' की 'मम्मी' आ गयी...  वो बच्चे का हाथ पकड़कर जाने लगी ......पीछे से कुछ लोगो ने 'बच्चे' से कहा -"कुछ कर देता तो  ...तुम ऐसा क्यूँ कर रहे थे?"

इसपर वो 'बच्चा'  एकदम से पलटा...दौड़कर 'बन्दर' के पास गया .... उसे चिढाते हुए तोतली बोली में जोर से बोला-"बन्दर मामा,  ओ बन्दर मामा!! मम्मी आ गयी  है!!अब डराकर दिखाओ!! "उसकी बात सुनकर वहा खड़े हम सब ठहाका लगाये बिना नहीं रह  सके.

Thursday, March 22, 2012

मैंने नेत्रदान किया है..और आपने ?


कई साल पहले की बात है ...शायद बी. एस सी. कर रही थी ..मेरी आँखों में कुछ परेशानी हुई तो डोक्टर के पास गयी..वहां नेत्रदान का पोस्टर लगा देखा... पहली बार इससे  परिचित हुई...उत्सुकता हुई तो पूछा, पर पूरी व सही जानकारी नहीं मिल पाई ....डॉक्टर ने बताया कि अभी हमारे शहर में ये सहूलियत उपलब्ध नहीं, पटना से संपर्क करना होगा ...फिर मै अपने कार्यों में व्यस्त होती गयी...सिविल सर्विसेस की तैयारी में लग गयी. हालाँकि इंटरव्यू  तक पहुँचने के बाद भी  अंतिम चयन नहीं हुआ ..पर इसमें कई साल निकल गए, कुछ सोचने की फुर्सत नहीं मिली...उसी दौरान एक बार टीवी पर ऐश्वर्या राय को नेत्रदान के विज्ञापन में देखा था....मुझे अजीब लगा कोई कैसे अपनी आंखे दे सकता है ?  आंखे न हो तो ये खूबसूरत दुनिया दिखेगी कैसे?  फिर सोचा जो नेत्रदान करते है वो निहायत ही भावुक किस्म के बेवकूफ होते होंगे.... कुछ साल इसी उधेड़-बुन में निकल गए...फिर एक आलेख पढ़ा और नेत्रदान का वास्तविक मतलब समझ में आया...' नेत्रदान' का मतलब ये है कि आप अपनी मृत्यु के पश्चात् 'नेत्रों ' के दान के लिए संकल्पित है...वैसे भी इस पूरे शरीर का मतलब जिन्दा रहने तक ही तो है....मृत्यु के बाद शरीर से कैसा प्रेम? मृत शरीर मानवता के काम आ जाये तो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है, है न?. 

सोचिये, जिनके नेत्र नहीं, दैनिक जीवन  उनके लिए कितना दुष्कर है ... छोटे-छोटे कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भरता ..अपने स्नेहिल संबंधों को भी न देख पाने का दुःख ...कितनी  बड़ी त्रासदी है...यह कितना कचोटता होगा, है न! ....नेत्रहीन व्यक्ति के लिए ये खूबसूरत, प्रकाशमय दुनिया अँधेरी होती है (यहाँ बाते सिर्फ शारीरिक अपंगता की है,  कई ऐसे लोग है जो नेत्रों के नहीं होने पर भी  दुनिया को राह दिखने में सक्षम  हुए, जबकि कई नेत्रों के होते हुए भी अंधे है) .

बहरहाल, अभी कुछ महीने पहले फेसबुक पर ऐसे एक विज्ञापन को देखा.एक बार फिर 'नेत्रदान' की बाते जेहन में घूमने  लगी ..उस तस्वीर को मैंने अपने वाल पर भी लगाया...उसी एक क्षण में मैंने संकल्प लिया कि मुझे नेत्रदान करना है ..पता करने पर मालूम चला कि इसके लिए सरकारी अस्पताल में फॉर्म भरना होता है...हमारे छोटे से शहर में सदर अस्पताल है... वहां  जाकर फॉर्म माँगा तो कर्मचारी चौंक गया ..उसने ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा, जैसे की  मै चिड़ियाघर से  भागा हुआ जानवर हूँ ..फिर शुरू हुई फॉर्म खोजने की कवायद ...कोना-कोना छान मारा गया पर फॉर्म नहीं मिला ( सोचिये, इतने हो-हल्ला  के बावजूद इस अभियान का क्या हाल है) ...कहा गया कि एक सप्ताह बाद आये ...गनीमत है एक सप्ताह बाद एक पुराना फॉर्म मिल गया ...हालाँकि उस फॉर्म की शक्ल ऐसी थी एक बार मोड़ दे तो फट जाये...
अब सुने आगे की दिलचस्प कहानी..मेरा भाई अनूप फॉर्म ले कर आया ..तब मै और मेरे अन्य भाई-बहन  मम्मी  के पास बैठे थे...हंसी-मजाक का दौर चल रहा था...अनूप आया उसने मुझे देने के बजाये मम्मी को फॉर्म दे दिया..मम्मी ने अभी पढना ही शुरू किया था कि मेरे शेष भाईयों ने भयानक अंदाज़ में (हालाँकि सब हंसने के मूड में ही थे ) मम्मी को बताना शुरू किया की वो किस चीज़ का फॉर्म है...मम्मी रोने लगी और फॉर्म के टुकड़े-टुकड़े कर दी ...बोलने लगी.. तुमको कौन सा दुःख है जो ऐसा चाह रही हो..लाख समझाने पर भी नहीं समझ पाई की नेत्रदान असल में क्या है ..उलटे मुझे खूब डांट पिलाईं कि ऐसा करना महापाप है...मतलब यह कि उन्हें भी वही गलतफहमियां है जो आमतौर पर लोगों को है...ये बात बताने का मकसद भी यही है  कि  नेत्रदान संबधित भ्रांतियों को समझा जाये...हालाँकि मैंने बाद में फिर फॉर्म लिया और उसे भर दिया....

अब थोड़ी जानकारी...आँखों का गोल काला हिस्सा 'कोर्निया' कहलाता है.. यह बाहरी वस्तुओं का बिम्ब  बनाकर हमें दिखाता  है.. कोर्निया पर चोट लग जाये, इस पर झिल्ली पड़ जाये या धब्बे हो जायें तो दिखाई देना बन्द हो जाता है..हमारे देश में करीब ढ़ाई लाख लोग कोर्निया  की समस्यायों से ग्रस्त  हैं..जबकि करीब 1करोड़ 25 लाख लोग दोनों आंखों से और करीब 80 लाख एक आंख से देखने में अक्षम हैं. यह संख्या पूरे विश्व के नेत्रहीनों की एक चौथाई है. किसी मृत व्यक्ति का कोर्निया मिल जाने से ये परेशानी दूर हो सकती है ...डाक्टर किसी मृत व्यक्ति का कोर्निया तब तक नहीं निकाल सकते जब तक कि उसने अपने जीवित होते हुए ही नेत्रदान की घोषणा लिखित रूप में ना की हो..ऐसा होने पर मरणोपरांत नेत्रबैंक लिखित सूचना देने पर मृत्यु के 6 घटे के अन्दर कोर्निया  निकाल ले जाते हैं..किंतु जागरूकता के अभाव में यहाँ  नेत्रदान करने वालों की संख्या बहुत कम है. औसतन 26 हजार ही दान में मिल  पाते हैं... दान में मिली तीस प्रतिशत आंखों का ही इस्तेमाल हो पाता है क्यूंकि ब्लड- कैंसर, एड्स जैसी गंभीर बीमारियों वाले लोगों की आंखें नहीं लगाई जाती ...  धार्मिक अंधविश्वास के चलते भी ज्यादातर मामलों में लिखित स्वीकृति के बावजूद अंगदान नहीं हो पाता....दूसरी तरफ मृतक के परिजन शव विच्छेदन के लिए तैयार नहीं होते.... अंगदान-केंद्रों को जानकारी ही नहीं देते  ..हमारे देश के कानून में मृतक की आंखें दान करने के लिए पारिवारिक सहमति जरूरी है, यह एक बड़ी बाधा है...जबकि चोरी-छिपे, खरीद-फरोख्त कर अंग प्रत्यारोपण का व्यापार मजबूत होता जा रहा है...

अंधता-निवारण एक बड़ी चुनौती है. भारत दुनिया का पहला देश है, जहां 'नेत्रहीन नियंत्रण राष्ट्रीय कार्यक्रम' चलाया जा रहा है... अपने देश की मात्र एक फीसद आबादी  प्रतिवर्ष नेत्रदान का संकल्प ले  तो अनेक दृष्टिहीन  "दृष्टि' पा सकते हैं.....इसके लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है, उनके डर को दूर करने की जरुरत है, अन्धविश्वास को ख़त्म करने की जरुरत है... बताया जाना चाहिए कि प्रत्यारोपण, सिर्फ कार्निया का होता है ... पुतली का नहीं... जिस तरह धन-संपत्ति  के लिए वसीयत तैयार की जाती है, वैसी ही वसीयत नेत्रदान के लिए भी तैयार की जानी चाहिए....

'नेत्रदान' के द्वारा हम किसी इन्सान को इस खूबसूरत  दुनिया को निरखने का अवसर दे सकते है....उसे दृष्टिहीनता के अंध -कूप से बाहर निकल सकते है ...वैसे भी किसी के काम आ जाने में जो सुख है वो यूँ ही जीवन गुजार देने में कहा...तो मित्रो 'नेत्रदान' करे ...यकीन माने आप हमेशा खुश रहेंगे !! आमीन!!

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Sunday, March 18, 2012

पिता का होना कितना बड़ा संबल है

पिता का होना कितना बड़ा संबल है...साहस है.... पापा के ऐसे बीमार पड़ने पर इस तथ्य को पूरी तरह समझ पा रही हूँ...उन्हें कैंसर है....नहीं जानती कि क्या होगा, 'उम्र' और अन्य दूसरी बीमारियाँ उनके इलाज में बाधक बन रही है ...पिछले ८-९ महीने से ठोस आहार नहीं ले पा रहे ...बहुत कमज़ोर हो गए है ...और मै बेबस हूँ .

पापा के व्यक्तित्व से हम सब बहुत प्रभावित रहे है .... सरल  और कठोर ...सबके मददगार .. किसी के सामने नहीं झुकनेवाले .. लोगों से घिरे रहनेवाले..और गुस्सा ऐसा जैसे वाकई बिजलियाँ कड़कने लगी हों . आवाज़ में ऐसी बुलंदी की पुकार दे तो मोहल्ला दौड़ा चला आये ... हम सबके आदर्श...

बचपन में हम भाई-बहन हमेशा पापा के इर्द-गिर्द ही रहा करते ..पापा के आने का घंटों इंतजार करते ...उनसे लड़ना- झगड़ना, लाड जताना, साथ में खाना, खेलना हमारी आदत थी...हम सब पापा के दुलारे रहे है ( हालाँकि बचपन में मै खुद को ज्यादा खुशनसीब मानती थी...अपने मने...हा हा हा ) पापा के पास बैठने के लिए हममे झगडा होता ..सारी बाते पापा से होती.. मम्मी की डांट से बचने के लिए पापा या बाबा-दादी का सहारा लेती. जब पापा बाज़ार से हमारे लिए पेंसिल, रबर, टॉफी या इसी तरह कि कुछ अन्य चीजें लाते तो हमारे इतराने कि कोई सीमा नहीं होती...मजाल था कि तब उसे कोई छू भी लेता!! पापा के कोर्ट में लिट्टी और समोसा बहुत स्वादिष्ट बनता , मम्मी के विशेष  डिमांड के बाद पापा उसे ले आते और तब हमारी 'पार्टी' ही मन जाती .

पापा मेरे लिए "सुपर स्टार" रहे है...ये "सुपर स्टारडम"  मैंने यूँ ही नहीं दिया था ...एक तो वे मेरी सभी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाले थे,  दूसरी तरफ मुझे लगता था कि मेरे पापा को पूरी दुनिया पहचानती है ( ये अलग बात है कि  उस वक़्त मेरी पूरी दुनिया, मेरा छोटा-सा कस्बाई शहर था, जहाँ सब, एक-दूसरे को जानते थे). जब मेरी दोस्तों के पापा कहते -'तुम सुधीर बाबु / भईया / भाई कि बेटी हो, वो बहुत अच्छे  है, इस शहर में कोई भी कार्यक्रम उनके बिना नहीं हो सकता ", तो गर्व की अनुभूति होती, खुश भी होती कि अब इस दोस्त के घर आने-जाने कि अनुमति आसानी से मिल जाएगी (बालमन का स्वार्थ... हा हा हा ). घर आकर खूब खुश होकर पापा से बताती. पापा मेरी बाते सुनते,  मुस्कुराते इस गर्वानुभूति ने तब आसमान छू लिया जब मेरे स्कूल के 'प्रिंसिपल' भी पापा के दोस्त निकले...फिर तो दोस्तों के बीच इसे खूब 'इतरा' कर बताया था...हाँ , पापा की आँखों से मुझे बहुत डर लगता था  (अब भी लगता है ). उनकी डांट से ज्यादा डर उनकी गुस्से में बड़ी हो जाती आँखों से लगता था. जब कभी मुझसे कोई गलती होती तो पापा की आंखे गुस्से से बड़ी-बड़ी हो जाती ...और मेरी आँखों से आंसू बहने लगते..

एक बार अंतर स्कूल प्रतियोगिता में भाषण, ग़ज़ल गायन, भजन गायन और थ्री लेग्स इवेंट में भाग लिया था ..मुझे सब में पुरस्कार मिला ...खूब शाबाशियाँ मिली ..पापा को बधाई दी गयी...वहा लोग उन्हें  'स्वयम्बरा के पापा' के रूप में पहचान रहे थे...पापा का चेहरा चमक रहा था ...उन्हें इतना खुश पहले नहीं देखा ...उन्होंने कुछ कहा नहीं पर आंखे सबकुछ कह गयी. पापा-मम्मी  ने हमें किसी काम के लिए नहीं रोका..हमेशा भरोसा और विश्वास होने की बाते की..हममे आत्मविश्वास पैदा किया...

पापा बीमार है...कमज़ोर भी....मै कुछ नहीं कर पा रही.... हर पल प्रार्थना करती हूँ कि पापा को तकलीफ न हो..वो जल्दी ठीक हो जाये ...हालाँकि नहीं जानती कि कि क्या होगा पर पापा को ऐसे देखकर भीतर ही भीतर  कुछ दरक रहा है ...
क्रमश :