मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Friday, January 13, 2012

'आल्हा'-लुप्त होती परंपरा

हमारे शहर आरा की ह्रदय स्थली रमना मैदान में लगभग हर शाम बुलंद आवाज़ में एक लोकगीत गूंजने लगता है.....इस गीत का जादू ऐसा की देखते ही देखते चारो ओर भीड़ इकठी हो जाती है....तालियाँ बजने लगती है ....वो हुंकार भरता है -
"रन में दपक -दप बोले तलवार ,
पनपन-पनपन तीर बोलत है ,
कहकह कहे अगिनिया बाण,
कटकट मुंड गिरे धरती पर "

जोश भर देनेवाली इस गायिकी को 'आल्हा' कहते है. इसे गानेवाले गायक का नाम है 'भोला'. इस लोक गायक का 'आल्हा' जब अपने चरम पर होता है तो सुननेवाले की भुजाएं फड़कने  लगती है ...खून की गति बढ़ जाती है....देश पर बलिदान हो जाने की इच्छा बलवती हो जाती है...... कहते है की इन गीतों के नायक आल्हा और ऊदल ने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया . उनका प्रण था की दुश्मन के हाथ देश की एक अंगुल धरती नहीं जाने देंगे-
"एक अंगुली धरती न देहब
चाहे प्राण रहे चली जाये "

आल्हा और उदल महोबा के रहनेवाले थे. इनकी शौर्यगाथा 'आल्हा' कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी कवि जयनिक द्वारा लगभग सन 1250 में लिखी गयी थी.  मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है,  जिसे भारत के लगभग सारे हिंदी प्रदेश में गाया जाता है...... हालाँकि क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव इनपर पड़ा है....भोजपुर में इनमे भोजपुरी मिली होती है...मगध में मगही.....अन्य दूसरे प्रदेशों में भी कुछ ऐसा ही हाल है.

 'आल्हा' एक  लोक गाथा है, जिसे गा कर सुनाया जाता है . लोकगाथा में कथा तत्व मुख्य रूप से और गेयता गौड़ रूप से विद्यमान होती है. आल्हा ऊदल 11वीं सदी में चंदेल शासक के सेनानायक थे, जिनकी वीरता का वर्णन जयनिक ने गेय काव्य के रूप में किया है . इन्होने कथा को  'आल्हा' नामक छंद में लिखी है. यह छंद इतना लोकप्रिय हो गया कि पुस्तक का नाम ही 'आल्हा' पड़ गया. इसके बाद जो भी कविता इस छंद में लिखी गयी उसे 'आल्हा' कहा जाने लगा.

वीर रस से ओत-प्रोत भोजपुरी प्रदेशों में आल्हा गाने की प्रथा बड़ी पुरानी है. दोनों वीर भाइयों आल्हा और ऊदल ने किस प्रकार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पृथ्वीराज से भीषण युद्ध किया, ये इस गाथा में गाया जाता है.

 आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं 52 तो कहीं 56 लड़ाइयाँ वर्णित हैं. इस लोकमहाकाव्य की गायिकी की अनेक पद्धतियाँ  हैं. आल्हा अर्द्धसम मात्रिक छन्द है, जिसके हर पद (पंक्ति) में क्रमशः 16-16 मात्राएँ,  दीर्घ-लघु होती  है.... यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार का  बहुत ज्यादा  प्रयोग होता है... एक लोककवि ने आल्हा के छन्द-विधान के बारे में कहा है -
आल्हा मात्रिक छंद सवैया सोलह पंद्रह यति अनिवार्य
गुरु लघु चरण अंत में रखिये सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य
अलंकार अतिशय्ताकारक करे राई को तुरत पहाड़
ज्यों मिमियाती बकरी सोचे गूंजा रही वन लगा दहाड़

आल्हा में संगति के रूप में  ढोलक, झाँझ, मँजीरा का प्रयोग  होता है ... लेकिन  विभिन्न क्षेत्रों में ye  बदलते भी हैं..  जैसे  ब्रज क्षेत्र में सारंगी  का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध के आल्हा-गायन में फूकनेवाले का भी  प्रयोग  किया जाता है..

आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल  है...प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है... धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है..  गाने की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती जाती है, ढोल बजने की गति में वैसा ही परिवर्तन होता जाता है. युद्ध भूमि में आल्हा और ऊदल के अद्भुत शौर्य के कारनामों के प्रसंग के समय गायकों की मुखाकृति देखते ही बनती है.....कभी कभी ये जोश में आकर ढोलक पर ही चढ़ जाते हैं और उसे घुटनों से दबाकर "हई जवान" की हुंकार के साथ युद्ध वर्णन करने लगते है. आल्हा गानेवालों की खूबी होती है की अपने लम्बे गायन के क्रम में ये अपने श्रोताओं को जैसे बहा ले जाते है.... वो भी गायक के साथ एकत्व का अनुभव करने लगता है...वैसी ही उद्दाम भावना...वैसा ही जोश....देश पर मर मिटने कि वैसे ही अभिलाषा जाग जाती है जैसी कभी आल्हा और ऊदल की रही होगी.

किन्तु देशप्रेम कि भावना को जगाने वाले आल्हा गायकों की स्थिति बहुत दयनीय है. इनकी बदतर आर्थिक स्थिति इन्हें इस से मुह मोरने पर बाध्य कर रही है. कोई भी आल्हा गायक अपने बच्चों को यह हुनर नहीं सिखाता. अपने शहर के जिस भोला उर्फ आकाश राज बादल के बारे में मै बता रही थी उनकी हालत भी बहुत ख़राब है. इन्होने कभी लाल कृष्ण आडवानी, गवर्नर हाऊस, लालू यादव के यहाँ गायिकी का प्रदर्शन किया तो कोलकाता, रामेश्वरम, लखनऊ के बड़े मंचो पर अपना जोहर दिखाकर तालियाँ बटोरी....आज ये रमना मैदान में मजमा लगाकर गाते है और पेट भरने कि कोशिश करते है.......हम सब ने भी इसकी आदत बना ली है...इसे सुनते हुए गुज़र जाते है...थोड़ी बहुत चर्चा भी कर लेते है.....बहुत हुआ तो ऐसे ही लिख मारते है.....पर मदद के लिए कुछ नहीं करते........कुछ भी नहीं करते.......अपनी परंपरा को यु ही मिटने के लिए छोड़ देते है ........

http://www.bhaskar.com/article/BIH-story-of-alha-udal-2763683.html?LHS