Wednesday, June 3, 2009

दहेज़- बापू का dar

अरी ओ

बडकी की अम्मा!

मुंह मीठा कर,

ब्याह तय हो गया

लड़केवाले ने

मोटरसाईकल , रंगीन टीवी, फ्रिज, दस भर सोना

और कुल जमा

'पांच लाख' रुपये के लिए कहा है

अब सोच मत

इंतजाम हो जाएगा

हाँ री,

मैंने घर को

गिरवी रख दिया है ,

न होगा तो बेच देंगे,

अरे क्या रखा है इसमें

याद है पिछली बरसात?

पहली बारिश में ही

हमारे इस कमरे की

पूरी छत बरस पड़ी थी

हाँ, रिश्तेदारों के पास भी दौड़ना होगा

क़र्ज़ के लिए

अब गाढे समय में वही तो काम आयेंगे

भले ही मूल के साथ सूद भी मांगेंगे

सुन तो,

कल पी. ऍफ़. के लिए अर्जी दे दूंगा

अब तो,

पार्ट टाइम भी करना होगा,

न न !

अरे, डर मत!

अब तबीयत को कुछ नहीं होगा

'मरूँगा' भी नहीं

बेटी की शादी जो है

सुन बडकी की अम्मा!

छोटकी की पढाई रोकनी होगी ,

कुछ सालों तक हाथ तंग रहेंगे न,

समझा लेना उसे, अच्छा!

बडकी की अम्मा !

बस,

कभी-कभी डर लगता है कि

इतने पर भी जो न हो सका दहेज़ पूरा

तो क्या हमारी बडकी को भी

जलना होगा

या गले में फंदा डालकर

झूल जाना होगा

और हमें इस संतोष के साथ जीना होगा

कि

हमने तो

अपनी बडकी का ब्याह कर दिया था न?

कर दिया था न अपनी बडकी का ब्याह?