Tuesday, July 22, 2008

पटना का महिला रिमांड होम

.मैं मीडिया से जूडी हूँ.हमारे पास स्टोरी आई ..पटना के महिला रिमांड होम की.वहाँ कैद औरतो की जिन्दगी सिसकीयूं में कटती है.उनके साथ जानवरों सा बर्ताव किया जाता है.जबकि उनमे से आधिकतर सिर्फ़ प्रेमविवाह कर ने के लिए बंद हैं। सलाखों में कैद ये लोग जिंदगी और अकेलेपन से जूझने को बेबस हैं.par इन्हे इनके अपनों से भी मिलने नही दिया जाता है .वहा के हालात ऐसे रूह काँप उठे।एक छोटे से कचरे से भरे कमरे में रहती हैं ये संवास्नी.चारो तरफ़ पसरी रहती है गंदगी .बात बेबात होती है मारपीट.खाने को मिलता है सदा गला खाना.वहा की अधिकतर लड़किया नंगे रहने को है मजबूर.इतने पर भी मंत्री मुस्कुराते हुए सबकुछ ठीक होने की बात करते हैं.जबकि महिला आयोग को तो कोई जानकारी ही नही. वो जांच करने की बातें करती है.वहाँ ऐसी लड़किया भी कैद है जो शारीरिक और मानसिक तौर पर अपांग हैं.जिन्हें उनके माँ बाप ने सडको पर भटकने के लिए छोड़ दिया था.एक आठ साल की bachi की कहानी ऐसी की दिल दहल जाए.इस मानसिक रूप से कमजोर मासूम के साथ बलात्कार हुआ था.वो कमजोर हो चुकी थी .मौत के बिलकूल करीब थी .पर प्रशासन हमेशा की तरह नियम कानून में उलझा हूया था। कहने का मतलब है औरतो को देवी कहने वाले इस देस में कबतक उन्हें ही नोचा जाएगा.दूसरी तरफ़ प्रशासन कबतक इस तरफ़ से नजरे चुराता रहेगा.कहने को तो ये रिमांड होम है जिसके नाम में मानवता है.पर हालात पूरी तरह अमानवीय है.सिंखाचो में कैद ये बेहाल जिंदगियां यही सोचती होगी की अगर यही जिन्दगी है तो जीने से बेहतर है मौत आ जाए.

vakt

वक्त माना tu अभी अच्छा नही
टूट jआऊँ साख से पत्ता नही
मान ले हिम्मत नही तुझमे अरे
कह रहा क्यों एक भी रास्ता nahi