Friday, February 19, 2016

कुछ पल होश खो देने के(अनुभव)

बिना बेड़ियों के कैद थी...भागना चाह रही थी लेकिन पहाड़ बधे थे पैरों में... हांफ रही थी  ... रास्ता न था...रोशन भी कुछ न था...धुंधलका पसरा था.... आँखे फाड़ रही थी..पर सब व्यर्थ

वो कुछ जंगल सा था... लोहे के मोटे मोटे  सरिया से बना हुआ भयानक जंगल..चारो ओर लोहा ही लोहा  ...जैसे किसी बड़ी इमारत को बनाने की तैयारी हो रही हो..

 आवाज़ें हाँ आवाजें सुनाई दे रहीं थी.. अस्पष्ट जैसे मंत्र बुदबुदाये जा रहे हो... या की जोर जोर से संवाद बोले जा रहे हों ...और कभी सुनाई देते ठहाके ,जोरदार  ...फिर कोइ पुकारता सुनो.. सुन रही हो ..सुन भी लो.. मैं सुनना चाहती थी ,देखना चाहती थी, पर कोशिशें व्यर्थ थी ...

सारी इन्द्रियां निष्क्रिय थीं....एक आवाज़ लगातार गूंज रही थी, बैक ग्राउंड म्यूजिक की तरह ...जैसे धातु के असंख्य पत्तर रगड़े जा रहे हो...लगातार....दिमाग के फट जाने की हद तक सुनाई देनेवाली आवाज.. फिर चीख जैसी सुनाई देने लगी ...एक नारी कंठ की चीख...अस्पष्ट

  तभी हौले से छुआ किसी ने.. देवदूत सा चेहरा बुला रहा था... गुलाबी पानी था नदी में ...उस पार हरे पहाड़ ... वहाँ एक बांसुरी रखी थी... मोर के कुछ पंख भी...बांसुरी बज रही थी... पंख यहां वहाँ उड़ रहे थे

.....अब माँ की स्पष्ट आवाज़ सुनाई दे रही थी....माँ गा रही थी " नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना ".......

Wednesday, November 25, 2015

सफ़ेद रंग (कविता)

कई रंग बटोरे
कुचियों को भी पकड़ा
आड़ी तिरछी रेखाएँ खींच ली
और कैनवास तो
जैसे तैयार ही बैठा था
सज जाने को
निखर जाने को

पर ज्यूंही भरनी चाही
लाल, पीली, हरी,
गुलाबी, नीली, मुस्काने
सब उड़ गयीं
गायब हो गयीं
जैसे कभी थी ही नहीं
जैसे कभी होंगी भी नहीं
बचा रह गया एक कोने में
सहमा सिकुड़ा सफ़ेद रंग
अपने होने पर घबराता सफ़ेद रंग
अनचाहा, पर जाना-पहचाना सफ़ेद रंग

मान लिया, सोच लिया ,स्वीकार किया
न हो दूसरे रिश्ते जीवन के
पर यह तो है न
जीवन का साथी, मेरी पहचान
सब रंगो का मूल
यह उदास सफ़ेद रंग
-----स्वयम्बरा






Friday, October 16, 2015

कर्फ्यू -लघु कथा

खूब धूमधाम से विसर्जन संपन्न हुआ। नगाड़े बजे । जयकारे लगे। लाउडस्पीकर पर फ़िल्मी गाने भी बजे। भक्तगण नाचते -गाते- झूमते गए भी।

अब जाके चैन आया तो थकान का अहसास हुआ। लगा कि दस दिनों की जोरदार भक्ति के बाद थोड़ा मनोरंजन तो बनता है ।

तो अख्तर के ठेके पर मिलना तय हुआ। खा के, पी के तृप्त हो गए तब बचे पैसे का हिसाब शुरू हुआ। सब ठीक चल रहा था कि ललन अटक गया। उसने ज्यादा चंदा काटा था तो हिस्सा भी ज्यादा चाहिए था।

बहस से शुरू हुई बात गाली-गलौज से होती हुई लाठी-डंडे पर उतर आयी।अब गुत्थम-गुत्था होने लगा। घमासान चल ही रहा था कि ललन ने कब कट्टा निकाला और कब दाग दिया, पता ही न चला। गोली, बीच-बचाव कर रहे अख्तर को जा लगी।

आज पांच दिन हो गए हैं। हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो गया था। कई लोग मारे गए। कितनी दुकाने जला दी गयीं .....और उसी दिन से शहर में कर्फ्यू जारी है....

Wednesday, September 2, 2015

बाँझ ( लघुकथा)

राजकुमारी के पाँव आज जमीन पर धरे नहीं धरा रहे थे ....क्या करे ...किधर जाए ...कभी सोहर गानेवालियों पर रूपए न्योछावर कर रही थी ...कभी महाराज जी को नमक, हरदी दे रही थी ...इधर से मुहबोली छोटकी ननदिया उससे हँसी कर रही थी तो उधर बगल की अम्मा जी अछ्वानी बनाने के लिए गुड मांग रही थी ....और बीच-बीच में राजकुमारी की नज़रे ‘उनपर’ भी टिक जाती ...आज कितने वर्षों बाद उन्हें खुश देखा ...एकदमे निश्चिंत....कनपट्टी की सफ़ेद रेखाएं भी आज नहीं दिख रही थी ....असमय उग आयी झुर्रियां अचानक से कम हो गयी थी .....आखिर विवाह के बीस साल बाद दोनों को औलाद का सुख मिला और जैसे जीवन ही बदल गया....
सोच रही थी राजकुमारी ....सोलह साल की उम्र में उसका विवाह छोटन से हुआ था ....छोटा परिवार था छोटन का ......दो भाईयोंवाला....बड़े भाई की शादी हो चुकी थी ......उसके तीन बेटे थे.... छोटन का विवाह भी धूमधाम से हुआ ...राजकुमारी घर में आयी .....शुरू के साल तो भाप जैसे उड़ गए ....पर जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, बाते होने लगी ....पहले दबी जुबान से, फिर एकदम सामने से .... निरबंस...बाँझिन...कोख खानेवाली जैसे ताने से शुरुआत होती, मार-पीट पर ख़त्म होती ....गालियाँ तो एकदम आम थी ....छोटन सब देखता...शुरू में एकाध बार विरोध भी किया पर बड़े भाई , भौजाई के सामने खुद को बेबस पाता....
और एक दिन बड़े भाई का बेटा बीमार पड़ गया .... माना गया कि सारी करतूत राजकुमारी की है ....इसी ने किसी से ‘डाइन’ करवाया है ...डाह जो है ....बस, फिर क्या था उसे मारने में दरिन्दगी की हद पार कर दी गयी ....दीवार से सर लड़ा दिया ....चईला से दागा गया....नाखून खींच लिए गए ...छोटन की भी पिटाई हुई और दोनों को घर से बाहर पटक दिया गया...
एक सिसकी सी आयी ....आंसू ठुड्डी तक बह आये  था.....चौंक गयी वो...ना...बिलकुल ना...आज इन बीते दिनों का क्या काम ....गुनगुनाने लगी राजकुमारी
 ‘‘ललना कवना बने फुलेला मजीठिया
 त चुनरी रंगाईब हो ‘’...
तभी फिर से एक सिसकी सुनाई दी ...’’धुत ई मन न ‘’...वह जोर जोर से गाने लगी...
‘’झनर-झनर बाजे बजनवा
रुनु झुनू बाबू खेले अंगनवा’’
पर सिसकी की आवाज़ तेज़ हो गयी ....अब वह रुदन में बदल गयी थी .....राजकुमारी ने ध्यान दिया ...वह आवाज़ बगल के पट्टा से आ रही थी ....
‘‘अरे ई तो जीजी है.....का हुआ?... कही...?’’
 राजकुमारी भागी बाहर की ओर....उधर, जिधर छोटन के भाई-भौजाई रहते थे ...दो साल हुआ बड़े भाई गुज़र गए ....दोनो छोटे बेटो को शहर की हवा लग गयी थी .....बड़ा बेटा पढ़ नहीं पाया तो अपनी पत्नी के साथ यही रहता था .... कुछ दिनों से बेटा-बहु और उनमे खटपट चल रही थी .....आज उनको मार पीट कर घर से बाहर निकाल दिया ....पडी थी वो रास्ते पर .....धुल-धूसरित....राजकुमारी ने यह दृश्य देखा तो काँप उठी .....रोब देखा था ...क्रूरता देखी थी इस चेहरे की ...और आज इतनी बेबसी ? इतनी निरीहता ?......उसने भाग कर जेठानी को सम्भाला उनके आंसू पोंछने लगी.....उन्हें चुप कराने लगी..
तभी उसने देखा कि जीजी की रुलाई हंसी में बदलने लगी है ...हंसी ठहाको में बदल गयी ....ठहाके बढ़ते गए ...उनका स्वर उंचा होता गया ....और अचानक उन्होंने राजकुमारी का हाथ झटक दिया ...उसे धकेल दिया...उठकर खडी हुई.... आसमान की ओर देखा और चल पडी....

लोग कहते है कि वो पागल हो गयी है....कभी इस गाँव, कभी उस गाँव दिख जाती है ....रजकुमरिया रजकुमरिया चिल्लाती रहती है.... 

Sunday, August 16, 2015

भारत भाग्य विधाता (लघुकथा)




    लघुकथा                                 भारत भाग्य विधाता
                                             ............................
                        चोर कही का ? चोरी करता है ? .....लात घूंसों की बौछार के बाद उसे घसीटते हुए  नाले के पास फेंक दिया गया ...गलती तो की थी उसने . दूकान में सजे तिरंगे को छूने की कोशिश की थी . अरे ये तिरंगे बिकने के लिए थे. बड़ी बड़ी जगहों पर फहराए जाने के लिए थे. पैसे मिलते उसके पैसे. और ये जाने कहा से आ गया नंग धडंग. लगा उन्हें छूने . गन्दा हो जाता तो कौन खरीदता ?  इन्हें सिर्फ बच्चा समझने की भूल मत कीजिये ...बित्ता भर का है  पर देखी उसकी हिम्मत ?  ये हरामी की औलाद होते है ? इनकी जात ही ऐसी होती है कि सबक नहीं सिखाया गया तो ...

                         उधर उसका चेहरा सुबक रहा था ....चोटों के नीले निशान उभर आये थे .....जिन्हें वह रह रह कर सहला रहा था ....पर आँखे तो अब भी चोरी-चोरी उधर ही देख रही थी जिधर तिरंगे टंगे थे .... जाने क्यों उसे ये बहुत भाते है ...केसरिया, हरा, सफ़ेद रंग ...जैसे इन्द्रधनुष हाथ में आ गया हो ...इसलिए तो आज  के दिन का वह महीनो  इंतज़ार करता है ....वैसे तो शाम तक ऐसे कई रंग बिरंगे कागज़ सड़को पर फेंके मिल जाते है .....वह इन्हें चुन लेता है और अपनी पोटली में सहेज कर रख लेता है ...किसी को नहीं दिखाता ....

                        पर पता नहीं कैसे आज इन्हें दूकान पर सज़ा देख मन में लालच आ गया ...न न वह सिर्फ छू भर लेना चाहता था .....लेकिन ....

                        अरे वह क्या ...उसकी आँखे चमक उठी ...ये तो वही है ...हाँ हाँ बिलकुल वही ....वह झपट कर उस नाले के और करीब गया और उसमे बह रहे प्लास्टिक के छोटे से तिरंगे को उठाया, पोछा और दौड़ पडा ....तभी बगल के सरकारी कार्यालय में राष्ट्र गान बजने लगा ...जन गण मन अधिनायक जय हो भारत भाग्य विधाता ...
.......................स्वयंबरा

Saturday, April 11, 2015

चिमनिया




उग आयी है चिमनिया चारो ओर
गुरुता का गुरुर है इनमे
ये अट्टाहास लगाती है
छिन लेती हैं मिट्टी की चिर-परिचित गंध 
सुलगती हैं 
उगलती है गहरा काला कोहरा 
सिकुड़ता जाता है नीला आकाश
और
हवा की साँसे घुटती चली जाती है

Tuesday, March 10, 2015

जिजीविषा
















वंचित जन
उग आते है
जंगलों से, झाडो से,
किसी खँडहर की गिरी दीवारों से
बंजर जमी की फटी बिवाईयों से
परवाह नहीं होती किसी की
सोचते भी नहीं कुछ भी
ये उपेक्षित
अक्खड लोग
जड़े जमा लेते है कही भी  
न हो खाद, पानी
हवा, सूरज का प्रकाश
न हो लालन-पालन का स्नेह
फिर भी एक जिद होती है
अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जिद
अपने जीवन को मुकम्मल बना लेने की जिद
ज़िंदा होने की गरिमा को बरकरार रखने की जिद
और वे उगते रहते है निरंतर
कुचले जाने के बाद भी
उखाड़ कर फेक दिए जाने के बाद भी  
सर उठाते है हर बार
बार – बार
लगातार 

Sunday, February 15, 2015

वह एक पागल बुढ़िया थी



















वह एक पागल बुढ़िया थी
अनजानी सी
पर पहचानी भी
शहर का हर कोना था
उसका ठिकाना
दिख जाती थी चौराहे पर
मूर्तियों के पीछे
गोलंबर पर
फुटपाथ पर भी
बसेरा था उसका
सब डरते, पास न जाते
फेक जाते बचा-खुचा
संतोष पा लेते
दान-पुण्य का
वह हरदम बड़बड़ाती
आकाश की ओर
हाथ उठाकर
गालियाँ देती
जैसे कि चल रही हो
एक लडाई
उसके और
भगवान के बीच
एक बड़ी सी गठरी में
छिपाए रहती
अपनी पूंजी
कोइ देखने की
कोशिश भी करता
तो पत्थरें चलाती
बहुत जतन से संजोया था उसने
कतरनो को
चिथडो को
पन्नियों को
रंगीन धागों को
फूटे बर्तनो को
बेरौनक आईना को
और
टूटी टांगो वाली एक गुडिया को
जिसे चिपकाये रहती थी
सीने से
उसके बाल बनाती
कपडे पहनाती
टांगो की पट्टी करती
और जब वह
उसे सुला रही होती
तो धीमे -धीमे
लोरी भी गाती
इस थाती को सहेजते
दिन गुज़रता
इश्वर से लड़ते
राते गुज़रती
पर कभी -कभी
सुनाई देती थी
एक तीव्र कांपती आवाज़
जो चीर दे किसी का कलेजा
तब वह
कसकर चिपटाए रहती गुडिया को
पनीली आँखे
ऊपर ही देखती जाती
उस पल वह कुछ न कहती
कुछ न करती
और एक दिन
बस अचानक ही
बुढ़िया मर गयी
सुना था
किसी ने
उसकी गुडिया चुरा ली
वह दिन भर
बदहवास भागती रही थी
यहाँ वहा ढूढती रही थी
जाने कितनो से मिन्नतें की थी
कितनो के सामने गिडगिडाई थी
देवालयों में सर पटकी थी
रोई छटपटाई थी
पर सब व्यर्थ
उस रात
गठरी खोल दिया था उसने
उसकी पूंजी बिखेर दिया था
वह जोर-जोर से लोरी गा रही थी
उसकी कांपती आवाज़ की तीव्रता
अपनी चरम पर थी
और सुबह,
उसका शरीर मृत हो चुका था
(एक सच )
....स्वयम्बरा











Saturday, January 17, 2015

मेरा हक

















तरस मत खाओ
मै नहीं हूँ बेचारा
मत दो खाना ,
कपडे भी मत दो
बस एक कलम दो
और कुछ किताबें दो
सोचने का विवेक दो
सपनो का अधिकार दो
और फिर देखना
छीन लूंगा उनसे
अपने हक की रोटी
अपने हक का कपड़ा
अपने हक का मकान
अपने हक का जीवन
(एम डी एम पर सोचते हुए )
........स्वयम्बरा

Friday, January 16, 2015

उदासियों की नदी

मेरे भीतर बहती है
उदासियों की एक नदी
एकदम भीतर
मन की परतों से बंधी
चुपचाप बहती है
खारे पानी की नदी
न उद्गम ना अंत
बस घूमती रहती है
गहरी  खाईयों में
कभी-कभी या अचानक ही
बादलों के फट जाने से
परत दर परत
गाद के जमते जाने से
आ जाती है   
भावनाओं की  बाढ़
कटने लगते है किनारे
टूटने लगती हैं सांसे
हाहाकार सा उठता है
फ़ैल जाता है रेतीला पानी
तटों को तोड़ते हुए जाने कहाँ तक
क्षण मात्र में
समूचा अस्तित्व डूब जाता है
फिर सबकुछ चूक जाने के बाद
पानी के भाप बनकर उड़ जाने के बाद
एक नया तटबंध बांधा जाता है जबरन
सीमाएं तय की जाती हैं
और नदी बहने लगती है
चुपचाप, फिर से
मन की परतों के भीतर
.................स्वयंबरा 

Monday, January 12, 2015

एम डी एम : आखिर कैसी योजना ?


दृश्य 1 
घंटी बजती है .....बच्चो के बीच घर से थाली लेकर स्कूल भागने की होड़ मच जाती है ...छोटी-बड़ी थालियाँ ...पिचकी -फूटी थालियाँ ...किसी ने दो-तीन थालियाँ भी ली है ...कोई बच्ची अपने नन्हे से भाई को गोद में लिए जा रही कि आज अपने खाने में उसे भी खिला देंगे...सभी दौड़े जाते है ... 

दृश्य २ 
एम् डी एम् का खाना बंट रहा... बच्चो को लगातार घुडकी दी जा रही ...उन्हें धकेला जा रहा ...और मांगने पर डांटा जा रहा...

दृश्य ३
बच्चे जैसे-तैसे, जहाँ -तहां बैठ कर खाना खा रहे...कोई बतानेवाला नहीं ...दुलार से समझानेवाला नहीं ...

दृश्य 4

 एक ३-४ साल का बच्चा रोते हुए घर जा रहा कि उसे खाना नहीं मिला...और ऐसा तो रोज ही होता है ...कुछ बच्चो को खाने के बदले झिडकिया मिलती है ..

दृश्य ५

पोशाक की राशि अब तक नहीं बंटी ...बच्चे हंगामा कर रहे ...बेंच, कुर्सिया तोड़ रहे ....सड़क जाम कर रहे

और ये किसी एक विद्यालय के दृश्य नहीं ...आखिर ये कैसी योजना ....आखिर ये कैसा बचपन... जिसे मांग कर खाने, पहनने की सीख दी जा रही..जिनके स्वाभिमान को अभी से कुचला जा रहा....अगर ये योजनाये बच्चो का अधिकार है तो सम्म्मानजनक तरीके से उनका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा ???

Monday, December 29, 2014

जाड़े की धूप
















(चंद पंक्तिया ) 

कुनमुनाई
अलस सुबह की
ठिठुरी धूप
*****
कुहरा घना
स्तब्ध पवन
सिकुड़ी धूप
*****
सूरज हंसा
अंगडाई लेकर
निखरी धूप
*****
अनमनी सी
खड़ी क्षितिज पर
विरही धूप
............स्वयंबरा 

Monday, November 3, 2014

दरद न जाने कोए .....

कहते हैं
जिन्नाद ने पकड़ा है उसे
वो चीखती है, चिल्लाती है
अट्टाहास लगाती है
गुर्राती है, मुट्ठियाँ भींचती है
खरोच डालती है पकडनेवाले को
और कभी-कभी,
एकदम गुमसुम सी हो जाती है
जैसे चुप्पी बैठ गयी हो होठो पर
फिर खारा पानी समूचे जिस्म पर छा जाता है
‘बाबा हो बाबा’ की गुहार लगाती है
उसकी चीत्कार से आकाश तक काँप उठता है
कहते है कि
यह जिन्नाद पड़ोस के उसी लडके का है
हाँ, तभी तो एक माह पहले
जब खेत के बीचोबीच
उसकी कटी हुई लाश मिली थी
यह बदहवास सी भागी थी वहाँ
और लौटी तो.......
तो वह थी ही नहीं भई
उसे तो जिन्नाद ने पकड़ लिया था  

Wednesday, October 1, 2014

था एक धनुर्धर राम

सूर्य-प्रभ-सम आलोकित,
वह वीर धनुर्धर था अद्भुत,
रावण-तम का संहार किया,
पुरुषोत्तम जग में कहा गया .

      xxxxxxxxx



शर- संधान करो तुम
तम जन-मन का हरो तुम
माया मृग फिर छलने आया
अब तो हुंकार भरो तुम

     





Friday, September 26, 2014

लडकी


लडकी,
बोल मत,
हंस मत,
देख मत,
सुन मत
ढांप खुद को,
खाना बना,
सफाई कर
और इन आवाज़ो से
थोडी सी फुरसत मिलते ही
लडकी
चुपके से
खोल देती है खिडकी
एक टुकडा धूप
और मुट्ठी भर हवा मे
अंगडाई लेकर
ठठाकर  हंस देती है
......स्वयम्बरा

Saturday, August 23, 2014

उर्मिला कौल : कुछ यादे

उर्मिला कौल......बचपन की यादे है धुंधली सी....मम्मी ‘मनोरमा’ पत्रिका लिया करती थी ....एक दिन उन्होने उसमे से एक फोटो दिखाया कहा कि ये उर्मिला आंटी का है .... इनकी लिखी एक कहानी छपी है...ये हमारे मुहल्ले मे ही रहती है...तस्वीर मे एक महिला शाल ओढे थी...मुस्कुराती हुई....बहुत सुंदर.....बाद मे बार एक बार मम्मी के साथ जाते हुए वे मिली...उन्होने मम्मी को घर मे बुलाया....मम्मी ने बताया कि ये वही है जिनकी कहानी छपी थी... .मै बहुत गर्व मह्सूस कर रही थी कि वो हमारे परिचितो मे है...उन्हे देर तक देखती रही... गौर वर्ण ......ऊंचा कद...प्रभावशाली व्यक्तित्व....बाद मे हमारे स्कूल मे कई बार अतिथि के तौर पर आयी.... साल बीते फिर वो हमारी संस्था द्वारा आयोज़ित कार्यक्रमो मे अभिभावक के तौर पर शामिल होकर हौसला अफजाई करती रही....संस्था द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनो मे उन्हे कई बार सुना...बाल महोत्सव मे कविता पाठ, कविता लेखन की जज वही हुआ करती थी...वर्ष २०११ मे हमारी संस्था यवनिका ने उन्हे ‘यवनिका सम्मान’ से सम्मानित किया...हालांकि इससे स्वयम ‘सम्मान’ का सम्मान बढा.... उनके स्नेहमयी व्यवहार ने मुझे ज्यादा आकर्षित किया था....सरल...सहज...मुस्कुराती हुई....मिलने पर गले लगा लेती....ढेर सारा आशीर्वाद देती...मम्मी से कहती नीलम, तुम्हारी बेटिया बहुत प्रतिभाशाली है....उनसे बहुत प्यार मिला...दुलार मिला....जाने-अनजाने उनसे प्रेरणा मिलती रही...कई साल पहले उनको सुनकर ही 'हाइकु' बारे मे जाना....उनकी कई हाइकु तो जुबान पर है-

अमावस
............
किसने बांधा,
पोटली मे अपने,
भोला सा चांद

इस उम्र मे भी उनकी कलम चलती रही थी.....शहर मे जिसने भी उनका आशीर्वाद चाहा, उसे मिला.....मै १५ अगस्त को स्कूल से आयी थी कि बहन ने उनके निधन का समाचार दिया....ये बहुत बडा झटका था... आशीर्वाद मे उठनेवाले हाथ सदा के लिये थम गये थे.....शब्द गुम गये थे....मेरे समझ मे कुछ नही आ रहा था....बस एक चुप सी लग गयी.... उनको नमन कर रही...विश्वास है वो जहा भी होगी, उनका आशीर्वाद सदैव हमे मिलता रहेगा.

Wednesday, July 30, 2014

मेरे तुम !


तुमने कहा
अकेले हो जाते हो
जब नही होती पास तुम्हारे
फिर तुम कह्ते हो
एकाकार हो मुझसे
आत्मा हूँ तुम्हारी
सुनो तो,
यह कैसी अजब बात है
अकेले होने का अह्सास
और एकत्व
अलग नही एक-दूसरे से?
लेकिन शायद यह ठीक भी है
क्युंकि तुम खुद भी विरुद्धो का सामंजस्य हो
बिल्कुल मेरे आराध्य की तरह
.......स्वयम्बरा
( विरुद्धो का सामंजस्य 'भगवान शंकर' के लिये कहा जाता है)

किस गांव की बात करते हो जी ?



किस गांव की बात करते हो जी ! 
किस्से- कहानी  वाले
मन को बहलानेवाले
सपनो मे आनेवाले

दिखाओ जी दिखाओ,
कहाँ हैं ये गांव ?
किस जगह जमती है चौपाल?
कहा सुने जाते है बिरहा, चैता, फगुआ के तान
किस डाल पर पडता है झुला
कहा गाती है वे बेखौफ, कजरिया
मिहनत और श्रम, भोले से जन
होते है क्या?

ना जी ना
वो गांव एक छलावा था
बस, एक दिखावा था
सच तो यह कि
शहर बनने की होड मे
विद्रुप हो गए गांव
कुरुप हो गए गाव

डर है वहा, खौफ भी वहा
कोलाहल है वहा, नरभक्षी भी वहा
भाग जाना चाहे, जो बसते है वहा

तो दोस्तो, अब का किस्सा यह कि
भारत गांवो का देश नही
लोभ और लालच ने लील लिया उन्हे
अब, लुप्त्प्राय है गाव
और हमने ही 
न्हे संरक्षितघोषित कर दिया है

.......स्वयम्बरा