मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Sunday, September 3, 2017

कच्ची धूप

बहुत रोई थी उस दिन घर आकर, जब जूलॉजी (इंटर) के क्लास में बेंच पर किसी ने लिख दिया था लव यु स्वयम्बरा....सहपाठियों (लड़कियों ने ही) ने दिखाया...फिर कलम से स्याही गिराकर उसे पोत दिया ताकि मेरी बदनामी(?) न हो...😂

मुझे भी लगा कि किसी ने सरे बाजार मेरी इज्जत उछाल दी...अजीब से ख्याल आने लगे थे कि पापा-मम्मी को पता चल गया तो ...मैंने तो उनका विश्वास ही खो दिया है...मानो ये कितनी भयानक गलती हो गयी हो...जबकि लिखनेवाले का पता तक नहीं था....

कुछ दिनों तक रोती रही थी...कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं थी...असल में बहुत संकोची थी उन दिनों...एकदम शर्मीली..खुद को गलत मान लिए जाने के डर से किसी से कह भी न पाई...ऐसी ही कुछ और घटनाएं हुई...

परिणाम ये हुआ कि लड़कों से घबराने लगी.. लो सेल्फ एस्टीम की शिकार..संकोच अब अति संकोच में बदल गया...हालांकि बाद में मेरी खुद से खुद की लड़ाई शुरू हुई और स्वयं को पूरी तरह बदल दिया...

और अब, पिछले दिनों मेरी एक स्टूडेंट हाथ में एक पूर्जा लिए रोती हुई आयी...किसी ने लिख दिया था उसके नाम के साथ किसी का नाम...

मुझे सब कुछ याद आ गया....असल में इस उम्र की सबसे बड़ी परेशानी खुद को ही गलत समझ लिए जाने की होती है...... ये डर इतना ज्यादा कि बच्चे स्वयं को हानि भी पहुंचा दे..भावुकता भी अत्यधिक ... एकदम अनियंत्रित...इतनी कि उसके सैलाब में सबकुछ बह जाए.....

 ऐसे में बच्चों को एक ऐसा साथ चाहिए जो उनपर पूरा विश्वास होने का भरोसा दे सके ..जो उन्हें तसल्ली दे कि गलत हो या सही हम हर पल  तुम्हारे लिए खड़े है.... तो तुम जो चाहो, गलत या सही मुझसे कह सकते/सकती हो...कुल मिलाकर ये कि उनका सच्चा दोस्त बन जाने की कोशिश की जानी चाहिए...

तो शायद अपने बच्चों से खूब बातें करने का ही ये परिणाम था कि ये  बच्ची बिना झिझक मेरे पास आ गयी.... उसे चुप कराया....खूब इधर- उधर की बातें की..फिर शुरू हुई काउंसलिंग...

अंततः उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी...राहत भरी मुस्कान..शायद उसे विश्वास हो रहा था कि कोई और उसे समझे न समझे मैं हूँ उसके साथ....तो कभी भी, कही भी, बेझिझक वह कुछ भी कह सकती है...

सुकून तो मुझे भी मिल रहा था जैसे मैंने खुद को ही सहलाया, दुलराया हो...आश्वश्त किया हो कि कोई हो न हो मैं हूँ न....

😊😊😊

Wednesday, August 30, 2017

ताकि रुमानियत बची रहे

दूर से देखो चाँद कितना सुन्दर....
पास जाओ तो पर्वतों, क्रेटरों, चट्टानों से भरा
एकदम निर्जीव, एकदम निस्पंद
कि सारे अहसासों, कल्पनाओं का 'दी एन्ड' हो जाए
इसलिए कुछ दूरी जरुरी
ताकि भ्रम बना रहे
रुमानियत बनी रहे
😃😃
----स्वयंबरा

Tuesday, August 22, 2017

आँखें

बहुत गहरी है आँखे
एकदम तीक्ष्ण, बेधती सी
जैसे सारे राज एकबारगी ही जान लेंगी
मन का कोना-कोना छान लेंगी
बचना चाहती हूँ अक्सर
कस कर लपेट लेती हूँ खुद को
आँखें मूँद लेती हूँ
कानों को ढांप लेती हूँ
होंठों को भींच लेती हूँ
अभिनय की चरम सीमा भी पार हो जाती है
पर मेरी सारी बेफिक्री धरी रह जाती है
सारे आवरण ग़ुम हो जाते हैं
बेबस, बेचैन सी देखती रह जाती हूँ
पल भर की बात होती है
उसकी एक नज़र
सारे राज जान लेती है
फिर वो बेहद मासूमियत से मुस्कुराता है
और हौले से पूछ बैठता है-ठीक तो हो?

---स्वयंबरा

Friday, August 18, 2017

आत्महत्या क्यूँ?



जिंदगी सबसे बड़ी चीज़ है....बाकि सब इसके बाद...
तो कोई यूँ ही नहीं आत्महत्या कर लेता...
ये बस आख़री दांव होता है ....सारे दुःखों से निजात पाने का....
उस इंसान को पलायनवादी, स्वार्थी मानकर भर्त्सना की जा सकती है पर यह सूचक है हमारे 'स्वार्थी' हुए जा रहे समाज का भी.....जो या तो अनभिज्ञ रहता है या अनदेखा करता है...कभी कभी तो क्रूर भी हो जाता है..
असल में जब जूझने की क्षमता चूक जाती है...सब कुछ नियंत्रण से बाहर हो जाता है तब इंसान ऐसा कदम उठाता है...
सबकी अपनी क्षमता होती है ....सभी अपने-आप अपनी यातनाओं से उबर नहीं पाते....ऐसे लोगों को मदद की दरकार होती है....
मुझे उस इंसान से हमदर्दी है ....कि उसके आस पास कोइ भी ऐसा नहीं रहा जो उसे तनाव से बाहर निकलने में सहयोग कर सके?....
आशा साहनी फिर ये....दोनों ही अकेलेपन के कारण हुए हादसे हैं....जाने हम किस समाज का निर्माण कर रहे जहां लोग अभिशप्त है अकेले रहने को...
---swayambara

Tuesday, July 25, 2017

जिंदगी

जिंदगी
मेरी यारा
न हो उदास ऐसे भी
रंग भरेंगे तुझ में भी
पल भर का इन्तजार है बस

देख न
बूंदें बरस चुकी हैं
धरा भी तृप्त हो चुकी है
खुशबु घुल रही हवाओं में
इंद्रधनुषी रंगत छा चुकी है
--स्वयंबरा

Monday, June 26, 2017

उफ़ , ये उबाऊ प्लेन यात्रा

बड़ा बोरिंग होता है प्लेन से यात्रा करना...एकदमे असामाजिक टाइप...

न चाय गरम, गरम चाय की मधुर आवाज़... न मूंगफली बेचनेवालों की पुकार...चढ़ने-उतरने की धक्कम-धक्का भी नहीं...और तो और दुनिया भर की पॉलिटिक्स पर छिड़ी 'जोरदार', 'हंगामेदार' बहस भी सुनाई नहीं देती है...😕

एकदम शांत माहौल....बनावटी.... बहुते 'सभ्य' लोग...बातें होती भी हैं तो ऐसे फुसफुसा के कि 'आएं' 'आएं' करते रहो...बइठे रहो चुपचाप, जइसे कोई 'पनिशमेंट' मिला हो...

मने कहना ये कि जब तक बहुते जरूरी न हो तब तक प्लेन से यात्रा नहींए करना है...बुझाया कि नहीं...😉😉😉😉😉😉😉😉
(आत्मालाप)

उपनिवेशवाद के दौर में भारतीय क्रिकेट

क्रिकेट इतना नहीं पसंद कि बेचैन रहूँ देखने के लिए...पर इसके बारे में जानना रुचिकर लगा कि कोलोनाईजेशन के दौर में यह जेंटलमैन गेम आखिर इंग्लैण्ड से भारत कैसे आया...कैसे इसका विकास हुआ..

इंग्लैंड, जहां क्रिकेट का जन्म हुआ, वहाँ ये वर्गीय विभेद का बड़ा उदाहरण था...उच्च आय वर्ग वाले शौक के लिए इसे खेलते इसलिए वो बैट्समैन होते...निम्न आयवर्ग वाले पैसे के लिए खेलते इसलिए बॉलर थे...और एक बॉलर कभी कैप्टेन नहीं बन सकता था...शायद इसलिए शुरुआती नियम अधिकतर बैट्समैन के पक्ष में ही बने थे...

ब्रिटिशों ने भारतीयों को असभ्य, जंगली ही माना था...उन्होंने कभी सोचा भी नहीं कि भारतीय इसे खेल पाएंगे...पर ऐसा हुआ नहीं..भारतीयो में पारसी समुदाय ने क्रिकेट खेलने की शुरुआत की...बाद के एक टूर्नामेंट में इनलोगों ने अंग्रेजों के जिमखाना क्लब को हरा दिया...ये एक बड़ी बात थी..

अंग्रेजों ने इस खेल को भी फूट डालने के लिए इस्तेमाल किया और हिन्दू, इस्लाम, पारसी आदि धर्मों  के आधार पर क्रिकेट क्लब बनाने पर जोर दिया....

आज की रणजी ट्रॉफी की तरह एक टूर्नामेंट आज़ादी से पहले भी हुआ करता था पर उसमे धार्मिक आधार पर बने क्लब भाग लेते...इस कारण गांधी जी ने भी इस टूर्नामेंट की आलोचना की थी....