मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Thursday, June 15, 2017

पापा मेरे पापा

वो दिन गर्मियों के थे।
लू चलने लगी थी। मीठे-मीठे आम मिलने लगे थे । स्कूल की छुटियाँ हो गईं थीं। अब मेरे पास पूरा एक महीना था, धूम मचाने के लिए। खेलने के लिए। शैतानी करने के लिए।

ऐसे तो हर शाम मोहल्ले भर के बच्चों की जमघट छत पर लग जाती और खूब धमाचौकड़ी मचती। पर छुट्टियों की बात ही निराली होती है। स्कूल जाने का झंझट ही नहीं ।रूटीन लाइफ से मुक्ति।रोज-रोज की चिक-चिक से पूरी आज़ादी। अब तो बस खेल, खेल और खेल।

पर घर के बड़े हमारी इस आज़ादी से जलते थे। वो इन ख़ूबसूरत छुट्टियों में भी हमें बांधकर रखना चाहते थे।
"बाहर नहीं निकलना है।"
" लू लग जाएगी।"
"होमवर्क पूरा करो।"
"घर में ही खेलो।"
(अब घर में कोई खेलता है क्या)

वो हमें हमारी आज़ादी देना ही नहीं चाहते थे(उस वक़्त लेकर रहेंगे आजादी वाली बात प्रचलन में नहीं थी, नहीं तो हम भी आवाज़ बुलंद करते)। विशेष तौर पर पापा। उनके कोर्ट की भी छुटियाँ हो गईं थीं। वो भी घर पर ही रहते। बुलंद स्वर में आदेश जारी हुआ कि घर से बाहर (छत पर भी) शाम को ही निकलना है। दोपहर का खाना खाने के बाद एक घंटा आराम करना है।और उसके बाद पढ़ाई करनी है। तो तय हुआ कि दोपहर में बस्ता लेकर पापा के पास बैठ जाना है।शाम तक पढ़ाई चलती। फिर छत पर जाने का मौका मिलता।

एक दिन की बात है पढ़ाई होते-होते शाम हो गयी। दोस्त आ गए। पापा गणित समझा रहे थे (असल में कमजोर थी उसमें)। पापा ने उन्हें  जाने को कह दिया और मुझे बिठाए रखा। अब मुझे व्याकुलता ने घेर लिया। बेचैनी की हद हो गयी। गणित के सारे सूत्र, जोड़-घटाव सर के ऊपर से निकलने लगे।
"सारे दोस्त छत पर खेल रहे और मैं यहाँ पढ़ रही। लानत है मुझपर।"
अब दिमाग चलने लगा। कैसे यहाँ से निकले। पापा से कहा बाथरूम जाना है। पापा बोले जाओ। तो गयी बाथरूम, फिर सीधे छत पर।

खूब इतरा रही थी, अपनी चालाकी पर। खेल शुरू हुआ। दौड़ा-दौड़ी, पकड़ा-पकड़ी। विशेष तौर पर कबड्डी, जो बेहद पसंद था। थोड़ी थकान हुई तो वहां एक पुरानी, लकडी की बनी आराम कुर्सी थी, उसपर बैठ गयी। गप्प का दौर शुरू हुआ। खूब मस्ती हो रही थी कि अचानक मेरी बीचवाली ऊँगली दो लकड़ी के बीच लगे पेंच में  फंस गयी। पहले आराम से कोशिश की निकालने की। नहीं निकली। दोस्तों ने कोशिश की। नहीं निकली। अब मेरी परेशानी बढ़ने लगी। रुआंसी हो गयी। दोस्तों ने सबको पुकारा। मम्मी और अम्मा (दादी) दौड़े-दौड़े आयीं। उन्होंने भी कोशिश की। अबतक मेरी ऊँगली से खून निकलना शुरू हो गया था। दर्द भी अपने चरम पर पहुँच गया। मैंने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। आवाज़ सुनकर पापा आये। उन्होंने सुपर मैन की तरह काम किया। पता न कैसे कुर्सी को मोड़ा और ऊँगली एकदम से निकल गयी। अब तो और जोर का रोना आया। पापा से चिपककर देर तक रोती रही।

चुप हुई तो पापा ने कहा - "बेटा, पापा-मम्मी से झूठ नहीं बोलना चाहिए। देखी न क्या हुआ।"

ये बात धक्क से लग गयी। ऐसी लगी कि अब तक लगी हुई है। बड़े होने पर भी यही माना कि पापा-मम्मी से झूठ बोलने की सजा ईश्वर देता है। उसके बाद याद नहीं कि बचपन में या बड़े होने के बाद भी, फिर कभी किसी बात के लिए इनसे झूठ बोला। किसी-किसी गलती के लिए खूब डांट खाती रही। गुस्सा भी आता रहा। पर बचपन की यह बात कभी भूल नहीं पायी। पापा का कहा वह वाक्य पैठ गया है मन में। अब तो मृत्यु तक यह न निकले।
----स्वयंबरा

Monday, June 12, 2017

जब हमारे घर देवी माता पधारीं😃

कुछ दिनों पहले हमारे घर देवी माता आयीं थी....

उनके साथ, सहायिका माता भी थीं...जिसका परिचय वो गर्व से करा रही थीं कि बेटा हम दाई लेकर घूमते है..इसलिए भरोसा करो...साईं बाबा ने मुझे तुम्हारे लिए भेजा है..

और उसके बाद असल बात शुरू हुई- मैं माता हूँ....दान दो बेटा..... सारे सुख मिलेंगे...घर आबाद होगा... नहीं दोगी तो भस्म हो जाओगी...सब ख़त्म हो जाएगा..

हमसब ने कहा कि माताजी ऊपर अभी-अभी हमारे पालतू कुत्ते को घूमने के लिए छोड़ा गया है....खूंखार है... जाइए जल्दी, वो नीचे ही आ रहा...

और देवी माँ, अपनी सहायिका के साथ तुरंत अंतर्ध्यान हो गयी...


(एकदमे सच्ची घटना...हां माता जी को डराने के लिए कुत्ते की मनगढ़ंत बात कही और वो जादू सा असर कर गया😂😂)

मन

बहुत रौब झाड़ता है मुझपर
दिमाग की सुनने ही नहीं देता
मन को चिनवा देती हूँ दीवारों में
उसकी बक-बक घुट जाए वहीँ पे
----स्वयंबरा

जाँता

घर के एक हिस्से को नए सिरे से बनवाने का काम चल रहा..कबाड़ हटाए जा रहे थे कि ये मिल गये..जाँता के दो पाट....अच्छा लगा ...हालांकि पुराने जमाने में लगभग हर गृहस्थ के पास ये होते थे...

पर भोजपुर क्षेत्र में जाँता महज 'गृहस्थ जीवन का आवश्यक साधन' मात्र नहीं रहा बल्कि परदेस गए परदेसी के पीछे उसके घर-गाँव में छूटी उसकी  विरहिणी के दुःख-दर्द का सच्चा साथी भी बना रहा...उसकी पीड़ा को सुनने-समझनेवाला...उसके आंसुओं को चुपके से अपने में समाहृत कर लेने वाला...

कहते है घर के किसी अंधेरे कोने में 'जाँता' चलाते हुए विरहिणी जब विरह की वेदना को धीमे-धीमे स्वर दे रही थी, तो जतसार गीतों का जन्म हुआ...

त लीही सभे भिखारी ठाकुर के बिदेसिया से एगो जतसार-
ए सामी जी,
जवना जून भइली सुमंगली त
जननी जे भाग जागल हो राम
ए सामी जी,
घरवा-भीतरवा बइठाइ कर गईल
कवन दो मुलुकवा भागल हो राम
ए सामी जी
सुसुकि-सुसुकि लोरवा पोंछत बानी
केहू नईखे सुनत रागल हो राम
---स्वयंबरा

Sunday, June 11, 2017

मुँह टेढ़े चाँद

ये तो क्षण मात्र की ही कैद थी...
तुम कहाँ बंधनो में आनेवाले..
तो अब जाओ....
मुझे भी तुम नहीं चाहिए ....
मुंह टेढ़े चाँद😑

(एक झूठ❤☺)
--स्वयंबरा

Saturday, June 10, 2017

अबोला

कहाँ सोचा था
कि हमारे बीच का 'अबोला,'
इतने शब्द, इतनी ध्वनिया छोड़ जायेगा
कि बदहवास-सी दौडती फिरुंगी
उन्हें आँचल में समेट लेने को
---स्वयंबरा

बोलो न माँ

उन्होंने कहा कि मृत्यु का शोक एक साल तक मनाया जाता है...कोई मांगलिक कार्य नहीं...
पर हमारा दुःख तो जीवन भर का ठहरा.. फिर ?

तय किया कि इसे उत्सव की तरह मनाएंगे....दुःख का उत्सव ...शोक का उत्सव...

तो गीत सुना, गुनगुनाया भी, यायावरी की, बगिया सजाया भी, पेड़-पौधों, चिड़ियों से बातें की...और जब-जब तुम्हारी याद आयी न, बच्चों को गले लगाया भी...

खूब-खूब प्यार भर लिया है मन में..

और तुम्हारे जाने के बाद के छः महीने निकाल ही लिए ...हँसते हँसते...तुम खुश हो न ..अब बोलो भी
--स्वयंबरा